Monday, 6 October 2014

Janam Din

पतिदेव का जन्मदिन आने वाला था बच्चों ने रोज नए नए प्लान बनाने शुरू कर दिए .. माँ इस बार पापा को मैक-डी में डिनर दे देते हैं ..नहीं पिज्जा हट चलते हैं .. कुछ नॉनवेज हो जाए इस बार??... मैं दूर से उनकी बातें सुन रही थी और हँस रही थी ...मैंने कहा , जिसका जन्मदिन है उस से तो पूंछ लो एक बार ... वो जायेंगे भी भला तुम लोगों के साथ... बिटिया का सुझाव आया, मम्मी से ग्रेट कुक कहाँ मिलेगा... ? पापा तो फैन हैं मम्मा के खाने के ... आप ही कुछ अच्छा सा बनाओ ना ... पूरा एक सप्ताह बीत गया कुछ निश्चय ना कर पाने पर बच्चों ने गेंद मेरी तरफ उछाल दी... मैंने कहा ठीक है आने दो पापा को उनसे पूंछती हूँ क्या खायेंगें इस बार जन्मदिन पर ... ? बच्चे एक सुर में ऐसे चिल्लाएं जैसे मैंने कोई बिजली की तार पकड़ा दी हो ... क्या माँ कमाल करती हो ! आप भी, पापा को बता कर आप तो सरप्राइज़ ही खत्म कर दोगी... नहीं उनसे मत पूछना ... बड़े बेटे ने जाल फेंका, जैसे मुझे चुनौती दे रहा हो ... क्या माँ इतना टाइम हो गया आपकी शादी को आपको नहीं पता है पापा को क्या पसंद है ? ये तो हम सब मिल कर बता सकतें हैं ... मैंने कहा, ओके! ठीक है, मैं पापा के साथ साथ तुमको भी सरप्राइज दे दूंगी... देट्स ग्रेट माँ ... बिटिया चहक उठी ... मैंने कहा- चलो! अब हो गया फिक्स अब अपना अपना काम करो सब...
बच्चों से तो बोल दिया ..मगर अपनी बरसों की आदत का क्या करूँ... इन से हर बात मे सलाह जरुर लेती हूँ ... और खास तौर पर खाने का मीनू, वो तो इनसे पूछें बिना बनाती ही नहीं कभी ... मैं तो अपनी शादी के बाद जब पहली बार रसोई घर मे गयी तो इनसे जरूरी टिप्स लेकर ही घुसी थी ...बस वो दिन है और आज का दिन है.. जो मेरे बनाए खाने की शान है ना, उसके पीछे हमेशा इनके टिप्स और सलाह का ही हाथ होता है ..और बच्चे चाहतें है कि इनके जन्मदिन का खाना इनकी सलाह के बिना बना लूँ ... सच में जैसे-जैसे शादी पुरानी होती है वैसे वैसे एक दूसरे की आदत पड़ती जाती है ... पूरा दिन सोच विचार मे बीत गया .. मैंने भी तय कर लिया जो कभी नहीं किया वो आज भी नहीं करूंगी एक बार इन से पूँछ लेती हूँ ऐसा भी क्या सरप्राइज़ कि मेहनत भी करूँ और इनको पसंद भी ना आये ... मगर बच्चे ?? उनको बहुत बुरा लगेगा माँ ने पूरा मज़ा खराब कर दिया. .. क्या करूँ क्या न करूँ .? इसी सोच मे थी कि माँ जी ने पूछ लिया बहू, बाबू का जन्मदिन आने वाला है ना ? मैंने कहा हाँ माँजी तीन दिन बाद है ... कोई नए कपडे हैं जन्मदिन पर पहनने को उसके ? मैंने कहा नहीं माँजी मैंने कहा था ना हो तो एक शर्ट ही ले आतें है मगर इन्होने मेरी बात हँसी मे उड़ा दी बोलने लगे मैं कोई छोटा बच्चा हूँ जो नए कपड़े पहनने हैं... तू रहने दे मैं बात करती हूँ आने दे शाम को, माँजी ने कहा ...
रात को थोडा देर से आये ये... तब तक माँ जी और बच्चे खाना खाकर टीवी देखने लगे बात करने का मौका ही नहीं बना .. हाँ सोते समय मैंने जरुर कह दिया आपके जन्मदिन पर मेरी तरफ से पनीर नान की दावत है ओके? ये मुस्कुराते हुए बोले दाल-रोटी खायेंगें तो जन्मदिन नही माना जायेगा ... मैंने कहा क्या है, अक्सर कुछ ना कुछ बनता रहता स्पेशल ... जन्मदिन के बहाने बन जाएगा तो क्या हो जायेगा ? जैसी तुम्हारी मर्जी ज्यादा झंझट मत करना ...अब बच्चों की उम्र है जन्मदिन मनाने की मेरी नहीं ... तो हम कौन बड़ी दावत कर रहे हैं माँ जी नए कपड़ों का कह रही थी ... ओहो अब तो तुम लोग हद कर रहे हो ..ये थोड़ा झुंझला कर बोले ... कितने कपड़े हैं मेरे पास? तुम्ही ने कहा था अब साल दो साल मत खरीदना कपड़े तब ज़रा अलमारी हल्की हो पायेगी ... चलो सो जाओ मैं सुबह माँ को समझा दूंगा ...
सुबह माँ जी की चाय लेकर उनके पास गई तो सबसे पहले उन्होंने पूछा बाबू उठ गया? मैंने कहा हाँ बाहर बैठे पेपर पढ़ रहें हैं बुला दूँ? नहीं रहने दे मैं चाय पीकर बाहर ही जा रही हूँ.. माँ जी ने कहा. और मैं भीतर आकर नाश्ते की तैयारी में लग गयी ...फिर कामवाली आ गयी उसके साथ बिजी हो गयी ... माँ जी आज एकादशी है क्या ? फिर चावल ना बनाऊं ? बोलती हुई मैं माँ के कमरे घुसी ... ये क्या माँ जी अपनी आँखें पोछ रही थी ... “माँ मेरा वो मतलब नहीं था” “जैसा तुम कहो” ... इनकी आवाज़ सुनायी दी ... मैंने पूछा क्या हुआ? दोनों मे से किसी ने जवाब नही दिया .. ये उठ कर बाहर चले गए मैं माँ जी के पास जाकर खड़ी हो गयी ..वो बोली इस अलमारी में से मेरा काला बैग तो निकाल .. मैंने यंत्रवत बैग निकाल कर दिया मगर कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या हुआ है.. तब तक ये भी वापस आ कर माँ जी के पलंग पर बैठ गए ..माँ जी ने हज़ार हज़ार के दो नोट निकाल कर इनकी ओर बढ़ा दिए ...और बोली इस जन्मदिन पर हूँ पता नहीं अगले तक रहूँ ना रहूँ फिर कोई नहीं कहेगा नए कपडे पहनो ... मेरे साथ मंदिर चलो ... मैंने माहौल को हल्का बनाने की कोशिश की, आप चिंता ना करो आप सौ साल तक जीओगी.. माँ जी मुस्कुरानें लगी हाँ हाँ क्यों नहीं.. तुम तो ज्योतिषी हो ना.. मैंने इनकी ओर देखा ... ये दोनों नोट मुठठी मे कस कर भीचें खड़े थे ... जो बात मै इतने दिन रात दिन साथ रह कर बताना चाहती थी पर ना समझा पायी वो माँ जी के आंसुओ ने समझा दिया... दरसल अपना जन्मदिन मनाने का उल्लास एक उम्र के बाद सभी का खत्म हो जाता है.. मगर परिवार के सदस्यों का उत्साह कभी कम नहीं होता ... बाद मे तो जन्मदिन एक पर्व जैसा हो जाता है पूरे परिवार के लिए ... खास कर माता पिता के लिए तो बच्चों का जन्मदिन वापस उनके जन्म के समय को दोहराने का बहाना सा हो जाता है ... अपनी पुरानी खट्टी मीठी यादों मे खो जाने का दिन .... इनका चेहरा देखा तो मैं जान गयी आज इनको जन्मदिन मनाने का मतलब समझ आ गया…

…dedicated to my loving Husband on his birthday.

3 comments:

  1. साfहत्य की fवधा कोई भी हो चाहे वह गद्य हो पद्य यानी कfवता हो या कहानी उसमें एक आंतfरक लय और उfचत प्रवाह होना जरूरी होता है। कथा में कोई संदेश निfहत हो या रोमांचक अंत तो वह फfलत और fनर्णयकारी होता है। इन अर्थों में जन्म fदन कथा बहुत प्रभावकारी fसद्ध होती नजर नहीं आई। यह शॉर्ट स्टोरी fसर्फ शॉर्ट ही बन कर रह गई स्टोरी नहीं बन पाई जैसे fक आपकी मेरी उमा और चैन की सांस थी। सच कहा जाए तो यह एक डायरीनुमा संस्मरणात्मक कथन का ही असर ध्वfनत करती है। जब तक कथा के कोई मायने न fनकले उसे पाठक को परोसने का कोई अर्थ नहीं होता। बेशक आपके प्रयासों में ईमानदारी रही हो लेfकन इस fस्थfत से आपको बचना होगा। वैसे जीवन के एक खूबसूरत fहस्से को उकेरती इस रचना के fलए आपको बधाई।

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  2. बच्चों की जिद, पत्नी की उलझन और माँ का प्रेम ये सभी मिलकर एक ध्यान खिचता है, परन्तु एक कहानी के रूप में इसे और भी मार्मिकता दी जा सकती थी. माँ का सहज भाव में ये कहना की कौन सा अगले वर्ष मै जिन्दा रहूंगी, बड़ी शिक्षा देता है.

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  3. एक लय पकड़ती हुयी कहानी अंत तक रुचिकर बनी रही। और भी अच्छा अंत अगर होता तो सोने पर सुहागा हो जाता।
    --ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
    ०८-१०-२०१४

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