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समझदार (लघुकथा)

समझदार “मंजरीबहुतसमझदारहै, वोइसबारभीइनकारनाकरेगीI” सासूमाँनेउसकीतरफदेखकरमुस्कुरातेहुएकहाI लेकिनआजयहसमझदारशब्दहथौड़ेकीतरहउसकेमनमस्तिष्कपरचोटकरगयाऔरउसकीऊँगलीपकड़करअतीतकीगलियोंमेंलेगयाI बचपनसेलेकरजवानीतककिनजानेकितनी

चैन की साँस

हर दिन एक नयी शुरुआत ... हर दिन सोचना शायद अब कुछ बदल जायेगा.. रोज का नियम सा बन गया है . मगर कुछ बदलने वाला नहीं है... हर औरत की जिंदगी एक जगह आ कर ठहर सी जाती है वही मुकाम आ गया है मेरे जीवन मे भी ...पति देव का अपना शिकायतों का पिटारा है ...सासू माँ की अपनी शिकायतें ...क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश भी की, कि मुझे क्या चाहिए? हमेशा अपनी पसंद थोपना, अपनी ही चलाना मै भी इन्सान हूँ.. मेरी भी कुछ पसंद नापसंद हो सकती है उस से किसी को क्या लेना देना....शुरू के कुछ साल तो कपूर के जैसे उड़ गए पता ही नहीं चले ... कुछ नए रिश्तों मे एक दूसरे को जानने मे निकल गए और कुछ बच्चों की परवरिश मे...
अब जब जिंदगी मे थोड़ा ठहराव आना चाहिए तो ये रात दिन की किट किट...बेवजह के झगडे.. नाराजगी ..जड़ मे कोई खास बात होती भी नहीं, मगर... बात है कि खत्म भी नहीं होती ...ज़रा ज़रा सी बात इतनी बड़ी हो जाती है कि कहना दुश्वार... बस कुछ मेरा मन भी विद्रोही हो गया है क्यों सुनू सबकी ...मेरा गुनाह औरत हूँ ? या पढेलिखे परिवार से हूँ? या हर सही गलत को सर झुका कर न मानने की आदत ? अगर ये ही है तो मेरी गलती नहीं है ... मेर…